षड्यंत्र की पूरी कहानी
ईसाई मिशनरीज ने पूज्य बापू जी को क्यों फंसाया?
गुरु परम्परा
पूज्य गुरुदेव संत श्री आशाराम बापू जी श्री रामानंद जी द्वारा स्थापित दादू दयाल वैष्णव संप्रदाय से आते हैं। उनके पूज्य गुरुदेव सांई लीला शाह जी महाराज हैं। संत कभी मरते नहीं हैं, वे हमेशा समाज के भले के लिए कार्य करते हैं और अपने विचारों से हमेशा समाज में रहते हैं। जो सभी संतों ने किया और समाज का भला करने की परम्परा को ही पूज्य बापू जी ने आगे बढ़ाया।
ईसाई मिशनरीज ने पूज्य बापू जी को क्यों फंसाया?
पूज्य बापू जी ने 60 और 70 के दशक से ही ईसाई मिशनरीज के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। वे दूर-दराज के गाँवों और आदिवासी इलाकों में जाकर लोगों की मदद करते थे। जब उन्होंने यह सब शुरू किया तो उनके सामने आया कि ईसाई मिशनरीज भारत के दूर-दराज और आदिवासी इलाकों में वहाँ की परिस्थितियों का लाभ उठाकर भोले-भाले हिन्दुओं को ईसाई धर्म में परिवर्तित करके धर्मान्तरण का भयानक खेल खेल रही हैं। 60 और 70 के दशक में किसी को भी भान नहीं था कि ईसाई मिशनरीज धर्मान्तरण का भयानक खेल खेल रही हैं। पूज्य बापू जी ने उसी समय से ईसाई मिशनरीज के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और हिन्दू समाज को सनातन से जोड़े रखने और भारत की एकता और अखण्डता बचाने के लिए सेवा कार्य शुरू किए।
1993 - शिकागो धर्म संसद
सन् 1993 में स्वामी विवेकानंद जी के 100 वर्ष बाद पूज्य संत श्री आशाराम बापू जी ने शिकागो धर्म संसद अमेरिका में वक्तव्य दिया। पूज्य बापू जी ने संसार में कुछ धर्म विशेष और राष्ट्र विशेष द्वारा जो हिंसा की जा रही है उसकी निंदा शिकागो धर्म संसद में की तथा भारतीय सनातन धर्म को दुनिया के सामने मजबूती से रखा। यह बात भी कुछ खास लोगों की आँखों में चुभ गई।
2004 - शंकराचार्य जी की रक्षा
काँची के शंकराचार्य श्री जयेन्द्र सरस्वती जी को सन् 2004 की दीपावली की आधी रात को एक हत्या के आरोप में उनके मठ से पुलिस द्वारा एक अनुष्ठान के दौरान गिरफ्तार कर लिया गया। उस समय जयललिता की सरकार थी और सभी द्रविड पार्टियों ने शंकराचार्य जी की गिरफ्तारी का जश्न मनाया। हमारे हिन्दू धर्म के चार प्रमुख मठों में से एक काँची के शंकराचार्य जी के साथ दक्षिण के पूरे ईसाई सिस्टम और पाश्चात्य शक्तियों से प्रभावित सिस्टम ने बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया। कोर्ट में जेठमलानी जी ने शंकराचार्य जी का केस लड़ा और उन्हें निर्दोष साबित किया। कोर्ट से बाहर का मोर्चा संभाला पूज्य बापू जी ने - उन्होंने पूरे भारत के सभी साधु-संतों, धर्म-गुरुओं को एक मंच पर लाकर आन्दोलन शुरू किया और हिन्दुओं को बदनाम करने के नरेटिव को समाज से उखाड़ फेंका।
2012 - धर्म संसद के अध्यक्ष
पूज्य बापू जी बहुत तटस्थता और कठोरता से भारत और सनातन विरोधी तत्त्वों का सामना करते थे। वे अतुलनीय ताकत से सनातन को एक करने का कार्य कर रहे थे। सभी कार्यों को देखते हुए और उनके ज्ञान के कारण उन्हें सन् 2012 में सभी संतों के द्वारा एकमत से धर्म संसद का अध्यक्ष चुना गया और आगे की रणनीति बनाई गई।
रोमन साम्राज्य का अंत और भारत से तुलना
पूज्य संत श्री आशाराम बापू जी ने अपने सत्संगों में बहुत बार बताया कि कैसे पूरे विश्व से वैदिक संस्कृति नष्ट की गई। उन्होंने मुगलों द्वारा किए गए अत्याचार तो बताए, साथ-साथ इस विश्व के सबसे बड़े दुश्मन ईसाईयत और उसके कुकर्मों को 70 के दशक से लगातार उजागर कर रहे हैं। सनातन संस्कृति को भी उसी तरह से नष्ट किया जा रहा है ईसाईयत द्वारा जैसे कभी रोम की सभ्यता को नष्ट किया था।
रोम में ईसाईयत का उदय (300-600 AD)
300 AD के समय रोम के सम्राट ट्रॉजन थे, जिन्होंने ईसाईयत के दुष्प्रभावों का पता चलते ही राज्य में ईसाईयत के विरुद्ध कठोर नियम पारित कर दिए - जो ईसाई बनेगा वो मृत्यु दण्ड भुगतेगा। इस कारण ईसाईयों ने इस सदी की सबसे गहरी चाल चली - वही चाल जो आज भारत में चली जा रही है।
गुप्त ईसाईयत की रणनीति
ईसाई लोग राजा के आदेश के बाद रोम में अपनी पहचान छुपाकर रखने लगे। उन्होंने दिखावे के लिए रोम की संस्कृति अपनाई - रोमी कपड़े पहनते, रोम में पूजे जाने वाले देवी-देवता पूजते, वो सब कुछ करते जो रोमी लोग करते थे। परन्तु अन्दर ही अन्दर खास पदों पर बैठे लोगों को ईसाई बनाते रहे। सभी गुप्त ईसाईयों को रोमी संस्कृति जैसा व्यवहार करने को कहा गया।
फिर जब इन्होंने रोम के राजा को ही "पाप से छुटकारा" का लालच देकर ईसाई बना लिया, तब शुरू हुआ ताण्डव - ईसाईयों की भीड़ ने एलेक्जेण्डरिया का ज्ञान से भरा पुस्तकालय जला दिया। पुस्तकालय जलाने का सबसे पहला वाकया एलेक्जेण्डरिया में ही मिलता है। फिर रोम के सभी मन्दिरों, देवी-देवताओं की मूर्तियों को तोड़ दिया गया। रोम की संस्कृति और पैगन समुदाय को पूरी तरह से दार्शनिक हाइपेशिया की ईसाई भीड़ द्वारा निर्मम हत्या के साथ खत्म कर दिया गया।
सभ्यता नष्ट करने के 4 कदम:
जिस तरह आज भारत में ही भारतीय परम्पराओं का मजाक उड़ाया जाता है और भारतीय संस्कृति को नीचा दिखाया जाता है, उसी तरह 300 AD से 600 AD के मध्य रोम के लोगों के साथ किया गया। रोम के लोगों ने अपनी संस्कृति से शर्मिंदा होकर ईसाई धर्म अपना लिया - जैसे भारत में लोगों को हिन्दू होने पर अलग-अलग माध्यमों से शर्मिंदगी महसूस कराई जाती है।
एलेक्जेण्डरिया का पुस्तकालय जला दिया, दार्शनिकों और धार्मिक गुरुओं पर चारित्रिक लांछन लगाए, ईसाई भीड़ द्वारा मार दिए गए और लोगों को ज्ञान से दूर करके भीड़ मात्र बना दिया। बिल्कुल उसी तरीके से मैकाले ने भारत में 1835 में शिक्षा नीति बदल दी जिससे असली ज्ञान से काट दिया गया। मैक्समूलर ने हमारे ग्रन्थों की गलत व्याख्या करके भारतीयों को अपने शास्त्रों पर शर्मिंदा होना सिखाया।
राम कृष्ण परमहंस जी, स्वामी विवेकानंद जी आदि सभी को बदनाम किया गया जो आज भी जारी है। पूज्य बापू जी का केस सबके सामने है। संतों और शंकराचार्यों से जनता को दूर कर दिया गया। ज्ञान से दूर, अपनी संस्कृति और अपने संतों से शर्मिंदा जनता दिशाहीन हो जाती है - फिर इन्हें कुछ भी बनाया जा सकता है।
भारत में गुप्त ईसाई महिलाएं सिन्दूर, चूड़ी, बिन्दी आदि सभी हिन्दू श्रृंगार करती हैं। पादरी भगवा कपड़े पहनते हैं और "ॐ नमो यीशु देवाय" जैसे मंत्रों का उच्चारण करके हिन्दू संत होने का नाटक करते हैं। पूरे तंत्र (सरकारी सिस्टम) में गुप्त ईसाईयत का जाल फैला दिया गया है - ठीक वैसे ही जैसे रोम में पिछले 200 सालों से भारत में किया जा रहा है।
हाइपेशिया से पालघर तक:
रोम की गणितज्ञ, खगोलशास्त्री और दार्शनिक हाइपेटिया को "चुड़ैल" बताकर ईसाई भीड़ द्वारा निर्वस्त्र करके, जीवित रहते उसके एक-एक अंग शरीर से अलग करके मारा गया। भारत में सन् 2020 में पालघर के साधुओं को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। पैटर्न वही है - ज्ञानियों और संतों को मारना या जेल में बंद करना।
आश्रम में गुप्त ईसाई एजेंटों का प्रवेश और नियंत्रण
पूज्य बापू जी के कार्यों से ईसाई मिशनरीज पहले ही परेशान थीं। जब 2004 में शंकराचार्य जी की मदद से दक्षिण भारत में भी धर्मान्तरण विरोधी कार्य प्रारम्भ हुए, तो ईसाई मिशनरीज और पाश्चात्य शक्तियों को समझ आ गया कि जब तक पूज्य बापू जी जीवित हैं, जब तक उनका परिवार एक है और उनकी योग वेदान्त समिति अच्छे से कार्य करती रहेगी, उनकी भारत में दाल नहीं गलेगी।
फिर शुरू हुआ पूज्य बापू जी के विरुद्ध भयानक षडयंत्र। ईसाई मिशनरीज और पाश्चात्य शक्तियों ने आश्रम में लगातार गुप्त ईसाई भेजने शुरू किए। उनमें से दो सबसे खतरनाक, खास प्रशिक्षण प्राप्त थे - एक को मनोविज्ञान और सम्मोहन (Hypnotism) में खास महारत प्राप्त थी।
पंकज मीरचंदानी (अर्जुन) की कार्यप्रणाली
- विश्वास जीतना: पहले दिन से इतनी सेवा-शुश्रूषा की कि सभी अति शीघ्र प्रसन्न हो गए। मात्र कुछ माह में पूज्य बापू जी के खास सेवकों में शामिल हो गया।
- टीम बनाना: आश्रम से निकाले गए उपद्रवी तत्वों की सूची बनाई, जो बापू जी से बदला लेने को उत्सुक थे। 1996-97 में धीमा जहर देने वालों को भी शामिल किया। इन सबकी एक टीम बनाई जो बाहर से षड्यंत्र क्रियान्वित करती।
- पदों पर कब्जा: खास पदों पर बैठे लोगों को अलग-अलग माध्यमों से अपने साथ मिलाया - किसी को सम्मोहन से, किसी को धन से। जो वफादार थे उन्हें झूठी फरियादों से निकलवा दिया या हटवा दिया। सभी आश्रमों और गुरुकुलों का मैनेजमेंट इस एजेंट के हाथ में आ गया।
- परिवार से अलग करना: पूज्य बापू जी को उनकी सुपुत्री प्रेरणामूर्ति भारती श्री जी, सुपुत्र नारायण साई जी और पूजनीय मैया जी से अलग कर दिया।
- सूचना पर नियंत्रण: पूज्य बापू जी तक वही खबर पहुँचने देता जो यह चाहता। इसकी मर्जी के बिना कोई भी पूज्य बापू जी से नहीं मिल सकता था - यह नियम आज 2025 तक जोधपुर जेल में भी चालू है।
- राजनीतिक शक्तियों से काटना: 2009 में अहमदाबाद आश्रम में पुलिस द्वारा आश्रमवासियों को पिटवाकर पूज्य बापू जी और गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के बीच दरार पैदा की। जब मोदी जी स्वयं बात सुलझाने आए तो षडयंत्र से मिलने नहीं दिया।
सन् 2012 आते-आते पूज्य बापू जी के धर्मान्तरण विरोधी कार्य उच्चतम स्तर पर थे। ईसाई मिशनरीज और पाश्चात्य शक्तियों ने इन एजेंटों पर दबाव बनाया कि वे अति शीघ्र बापू जी को रास्ते से हटाएं क्योंकि भारत पर ईसाईयत के कब्जे में वे बहुत बड़ी बाधा बने हुए थे।


नम्बी नारायणन से तुलना
भारतीय वैज्ञानिक नम्बी नारायणन जी को कुछ खास शक्तियों ने भारतीय कानून की खामियों का प्रयोग करके फंसाया था। वे अपना केस खुद लड़ रहे थे तो 24 वर्षों की लम्बी लड़ाई के बाद आज निर्दोष बाहर हैं।
परन्तु पूज्य बापू जी का केस इन गुप्त ईसाई एजेंटों के हाथ में है जो कभी उन्हें सिस्टम की खामियों का प्रयोग करके बाहर नहीं आने देंगे। ये ईसाई एजेंट लगातार पूज्य बापू जी को मेडिकली समाप्त कर देना चाहते हैं ताकि इनके ईसाई होने की बात अंत तक गुप्त ही रहे।
आश्रम पर कब्जा - वर्तमान स्थिति
इन गुप्त ईसाई एजेंटों ने:
- सभी आश्रम पदों पर कब्जा बनाए रखा है
- आश्रम के समस्त धन पर नियंत्रण कर लिया है
- पूज्य बापू जी द्वारा जो ईसाई धर्मान्तरण विरोधी कार्य पूरी निष्ठा से किया जाता था उसे पूरी तरह बंद कर दिया है
- सेवा कार्यों को धन कमाने का माध्यम बना दिया है
- अगर कहीं कोई कार्य करते भी हैं तो मात्र दिखावे के लिए
- भण्डारे होते हैं वे भी धनाढ्य साधकों से मोटी रकम वसूलने के उद्देश्य से
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