प्रस्तावना: एक अकेले संत का मिशनरियों के विरुद्ध महायुद्ध
भारत में ईसाई मिशनरी संगठन प्रतिवर्ष हज़ारों करोड़ रुपये खर्च करते हैं आदिवासी, दलित और ग़रीब हिन्दू समुदायों को ईसाई बनाने के लिए। ये संगठन अंतरराष्ट्रीय फंडिंग से संचालित होते हैं और इनके पास अपार संसाधन हैं। इनके विरुद्ध खड़े होना किसी साधारण व्यक्ति के बस की बात नहीं है।
लेकिन संत श्री आशाराम बापू जी ने यह असंभव कार्य किया। उन्होंने न केवल मिशनरियों के धर्मान्तरण अभियान को चुनौती दी, बल्कि एक व्यवस्थित और बहुआयामी रणनीति तैयार की जिसने मिशनरियों की नींद उड़ा दी। बापू जी ने समझा कि मिशनरी किन-किन कमज़ोरियों का फ़ायदा उठाकर धर्मान्तरण कराते हैं और प्रत्येक कमज़ोरी के लिए एक समाधान प्रस्तुत किया।
1. भोजन-भजन-दक्षिणा: भूख का इलाज, आस्था की रक्षा
मिशनरियों की रणनीति
ईसाई मिशनरी आदिवासी क्षेत्रों में सबसे पहले भोजन और धन का प्रलोभन देते हैं। भूखे और ग़रीब आदिवासियों को कहा जाता है - "ईसाई बनो, खाना मिलेगा, पैसा मिलेगा।" यह सबसे पुरानी और सबसे प्रभावी धर्मान्तरण रणनीति है।
बापू जी का समाधान
बापू जी ने "भोजन-भजन-दक्षिणा" कार्यक्रम शुरू किया। इसमें:
- भोजन: आदिवासी क्षेत्रों में निःशुल्क भोजन वितरित किया जाता था। कोई शर्त नहीं, कोई धर्मान्तरण नहीं - बस भोजन।
- भजन: भोजन के साथ भजन-कीर्तन होता था, जिससे आदिवासियों में अपनी हिन्दू आस्था और संस्कृति के प्रति लगाव बना रहता।
- दक्षिणा: आदिवासी परिवारों को नकद राशि दी जाती थी ताकि उन्हें मिशनरियों के पैसे के प्रलोभन में न फँसना पड़े।
जहाँ मिशनरी पैसे और भोजन के बदले धर्म बदलवाते थे, वहाँ बापू जी ने बिना किसी शर्त के भोजन, भजन और दक्षिणा दी। इसने मिशनरियों की सबसे बड़ी रणनीति को विफल कर दिया।
2. गौशाला: गोमाता की रक्षा, हिन्दू संस्कृति की रक्षा
बापू जी ने भारत भर में सैकड़ों गौशालाएँ स्थापित कीं। इन गौशालाओं में:
- हज़ारों गायों को तस्करों से छुड़ाकर सुरक्षित आश्रय दिया गया
- गायों की चिकित्सा, भोजन और देखभाल की व्यवस्था की गई
- गोमूत्र और गोबर से उत्पादों का निर्माण कर आदिवासियों और ग्रामीणों को रोज़गार दिया गया
- गोसेवा के माध्यम से हिन्दू संस्कृति और मूल्यों को जीवंत रखा गया
गौरक्षा क्यों महत्वपूर्ण है धर्मान्तरण विरोध में? गाय हिन्दू संस्कृति का अभिन्न अंग है। जब मिशनरी किसी हिन्दू का धर्मान्तरण करते हैं, तो सबसे पहले उसे गोमांस खिलाते हैं ताकि उसका हिन्दू संस्कृति से नाता टूट जाए। गौशालाओं के माध्यम से गाय के प्रति श्रद्धा को जीवित रखना धर्मान्तरण के विरुद्ध एक सांस्कृतिक ढाल है।
3. निःशुल्क आयुर्वेदिक चिकित्सा: मिशनरियों की "चिकित्सा धोखाधड़ी" का पर्दाफ़ाश
यह शायद बापू जी की सबसे महत्वपूर्ण पहलों में से एक है और इसकी कहानी अत्यंत चौंकाने वाली है।
मिशनरियों की "चिकित्सा चाल"
ईसाई मिशनरी आदिवासी क्षेत्रों में निःशुल्क चिकित्सा शिविर लगाते हैं। लेकिन इन शिविरों में एक अत्यंत कपटपूर्ण खेल खेला जाता है:
पहला चरण: बीमार आदिवासी को शिविर में बुलाया जाता है। उसे विटामिन-सी की गोलियाँ दी जाती हैं (जो वास्तव में कोई दवाई नहीं है, बस विटामिन है)। फिर कहा जाता है - "अपने शक्तिशाली हिन्दू देवताओं से प्रार्थना करो कि तुम ठीक हो जाओ।"
स्वाभाविक रूप से, विटामिन-सी से बीमारी ठीक नहीं होती। रोगी वैसा का वैसा रहता है।
दूसरा चरण: कुछ दिनों बाद उसी रोगी को फिर बुलाया जाता है। इस बार उसे असली दवाई दी जाती है। और कहा जाता है - "अब जीसस से प्रार्थना करो।"
असली दवाई खाने से रोगी ठीक हो जाता है। और उसके मन में यह बात बैठ जाती है कि "हिन्दू देवता काम नहीं करते, जीसस काम करते हैं!"
यह एक भयानक मनोवैज्ञानिक चाल है। भोले-भाले आदिवासी जो विज्ञान और चिकित्सा शास्त्र नहीं जानते, वे इस चाल में फँस जाते हैं और ईसाई बन जाते हैं।
बापू जी का जवाब
बापू जी ने इस कपटपूर्ण रणनीति को पहचाना और उसका जवाब दिया:
-
निःशुल्क आयुर्वेदिक दवाई वितरण: आदिवासी और ग़रीब क्षेत्रों में निःशुल्क आयुर्वेदिक दवाइयाँ वितरित की गईं - असली दवाइयाँ जो वास्तव में काम करती थीं।
-
"आरोग्य निधि" पुस्तक: बापू जी ने "आरोग्य निधि" नामक पुस्तक प्रकाशित की जिसमें सामान्य बीमारियों के सरल और सस्ते आयुर्वेदिक उपचार बताए गए। यह पुस्तक लाखों प्रतियों में वितरित की गई।
-
एलोपैथिक कंपनियों से संघर्ष: बापू जी की सस्ती आयुर्वेदिक दवाइयों ने एलोपैथिक दवा कंपनियों के मुनाफ़े पर चोट की। इन कंपनियों ने बापू जी पर अदालती मुकदमे किए। लेकिन जब दवाइयों की जाँच हुई, तो सभी दवाइयाँ शुद्ध और गुणवत्तापूर्ण पाई गईं।
4. आवास निर्माण: बेघरों को छत
मिशनरी ग़रीबों को घर बनाकर देते हैं - इस शर्त पर कि वे ईसाई बनें। बापू जी ने योग वेदांत सेवा समिति के माध्यम से:
- ज़रूरतमंदों के लिए मकान बनवाए - बिना किसी धार्मिक शर्त के
- प्राकृतिक आपदाओं में राहत कार्य चलाए
- बाढ़, भूकंप, सूखा - हर आपदा में बापू जी का संगठन सबसे पहले पहुँचता था
5. रोज़गार: आत्मनिर्भरता का मार्ग
मिशनरी ग़रीबों को नौकरी और पैसे का प्रलोभन देकर धर्मान्तरण कराते हैं। बापू जी ने इसका जवाब दिया:
- आदिवासियों और ग़रीबों को लघु उद्यम शुरू करने में सहायता की
- कौशल विकास कार्यक्रम चलाए
- स्वरोज़गार के अवसर उपलब्ध कराए
- उद्देश्य था कि आदिवासी आत्मनिर्भर बनें ताकि उन्हें मिशनरियों के पैसे के प्रलोभन की आवश्यकता ही न पड़े
"ग़रीबी धर्मान्तरण का सबसे बड़ा हथियार है। बापू जी ने ग़रीबी मिटाकर इस हथियार को कुंद कर दिया।"
6. गुरुकुल: शिक्षा के माध्यम से संस्कृति रक्षा
बापू जी ने भारत भर में अनेक गुरुकुल स्थापित किए जहाँ बच्चों को वैदिक शिक्षा, संस्कृत, योग, भारतीय इतिहास और संस्कृति की शिक्षा दी जाती थी।
स्कूल बस की चाल: एक भयावह सत्य
मिशनरी बच्चों को निशाना बनाने के लिए एक अत्यंत घातक चाल का उपयोग करते हैं। यह कहानी सुनकर आप स्तब्ध रह जाएँगे:
ईसाई मिशनरी स्कूलों की बसों में एक सोची-समझी चाल खेली जाती है:
- स्कूल बस चल रही है, बच्चे बैठे हैं
- अचानक ड्राइवर/कंडक्टर बस रोक देता है - बस "खराब" हो जाती है
- बच्चों से कहा जाता है - "अपने शक्तिशाली हिन्दू देवताओं से प्रार्थना करो कि बस चल पड़े"
- बच्चे प्रार्थना करते हैं, लेकिन बस नहीं चलती (क्योंकि ड्राइवर जानबूझकर इंजन स्टार्ट नहीं करता)
- फिर कहा जाता है - "अब जीसस से प्रार्थना करो"
- बच्चे जीसस से प्रार्थना करते हैं और ड्राइवर चुपके से बस स्टार्ट कर देता है - बस "चमत्कारिक रूप से" चल पड़ती है!
प्रभाव: बच्चों के कोमल मन में यह बीज बो दिया जाता है कि हिन्दू देवता कमज़ोर हैं और जीसस शक्तिशाली हैं। ये बच्चे बड़े होकर या तो ईसाई बन जाते हैं या कम से कम अपने हिन्दू धर्म में आस्था खो देते हैं।
बापू जी के गुरुकुलों में बच्चों को वैदिक शिक्षा दी जाती थी ताकि वे अपनी संस्कृति और धर्म के प्रति सुदृढ़ रहें और ऐसी चालों में न फँसें।
7. घर वापसी: धर्मान्तरित हिन्दुओं की स्वगृह वापसी
बापू जी ने शंकराचार्य और अन्य संतों के साथ मिलकर "घर वापसी" अभियान चलाया। इस अभियान के तहत:
- लाखों धर्मान्तरित हिन्दुओं को पुनः हिन्दू धर्म में वापस लाया गया
- जो लोग छल, प्रलोभन या दबाव में ईसाई या मुसलमान बन गए थे, उन्हें सम्मानपूर्वक घर वापसी कराई गई
- इसे "धर्मान्तरण नहीं, घर वापसी" कहा गया - क्योंकि ये लोग मूलतः हिन्दू थे और अपने मूल धर्म में लौट रहे थे
यह अभियान मिशनरियों के लिए सबसे बड़ा झटका था। वे जो करोड़ों खर्च करके धर्मान्तरण कराते थे, उनका "निवेश" बापू जी की घर वापसी से "बर्बाद" हो जाता था।
8. एक मंच: सभी संतों की एकता
बापू जी ने सभी हिन्दू संतों को एक मंच पर लाने का ऐतिहासिक कार्य किया। इसकी आवश्यकता क्यों थी?
"हिन्दू आतंकवाद" का झूठा नैरेटिव
कुछ शक्तियों ने "हिन्दू आतंकवाद" (Hindu terrorism) का एक झूठा नैरेटिव गढ़ने का प्रयास किया। इस नैरेटिव के अनुसार हिन्दू संगठन "आतंकवादी" हैं। इस षड्यंत्र का उद्देश्य था:
- हिन्दू संगठनों को "आतंकवादी" घोषित करवाकर उन पर प्रतिबंध लगवाना
- हिन्दू समाज को रक्षात्मक स्थिति में धकेलना
- हिन्दू धर्म की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धूमिल करना
बापू जी ने सभी संतों को एकजुट कर इस झूठे नैरेटिव का मुँहतोड़ जवाब दिया। एक मंच पर सभी संत एकजुट होकर बोले और "हिन्दू आतंकवाद" के झूठ को उजागर किया।
9. तुलसी पूजन दिवस (2014) और मातृ-पितृ पूजन दिवस (2006)
तुलसी पूजन दिवस
25 दिसंबर को पूरी दुनिया में "क्रिसमस" मनाया जाता है। भारत में भी ईसाई मिशनरी इस दिन का उपयोग बड़े पैमाने पर प्रचार और धर्मान्तरण के लिए करते हैं।
बापू जी ने 25 दिसंबर को तुलसी पूजन दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत की। तुलसी का पौधा हिन्दू संस्कृति में अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस दिन लाखों हिन्दू तुलसी की पूजा करते हैं, जिससे:
- ईसाई प्रचार के प्रभाव को सांस्कृतिक प्रतिकार मिलता है
- हिन्दू बच्चों में अपनी संस्कृति के प्रति गौरव जागता है
- "क्रिसमस" के आकर्षण का एक सकारात्मक विकल्प उपलब्ध होता है
मातृ-पितृ पूजन दिवस (2006)
14 फ़रवरी को पश्चिम में "वैलेंटाइन डे" मनाया जाता है। भारत में इसका प्रभाव बढ़ता जा रहा था, जो पश्चिमी सांस्कृतिक आक्रमण का एक हिस्सा है।
बापू जी ने 14 फ़रवरी को मातृ-पितृ पूजन दिवस घोषित किया। इस दिन बच्चे अपने माता-पिता की पूजा करते हैं, उन्हें सम्मान देते हैं। यह भारतीय संस्कृति के मूल मूल्य - माता-पिता की सेवा - को पुनर्जीवित करता है।
2012: धर्म संसद के अध्यक्ष चुने गए
2012 में बापू जी को धर्म संसद का अध्यक्ष चुना गया। यह हिन्दू समाज में उनके अद्वितीय स्थान और सम्मान का प्रमाण था। धर्म संसद के अध्यक्ष के रूप में उनके पास हिन्दू समाज को एकजुट करने और धर्मान्तरण विरोधी अभियान को और अधिक शक्तिशाली बनाने की क्षमता थी।
और ठीक इसके एक वर्ष बाद - 2013 में - उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया।
क्या यह संयोग है कि जो व्यक्ति मिशनरियों के सबसे बड़े विरोधी थे, धर्म संसद के अध्यक्ष बने, और एक वर्ष के भीतर जेल में डाल दिए गए?
इन पहलों का सम्मिलित प्रभाव
बापू जी की इन सभी पहलों ने मिलकर एक अभेद्य सुरक्षा कवच तैयार किया जिसने ईसाई मिशनरियों के धर्मान्तरण अभियान को गंभीर चोट पहुँचाई:
| पहल | मिशनरी रणनीति जिसे विफल किया |
|---|---|
| भोजन-भजन-दक्षिणा | भोजन/धन के बदले धर्मान्तरण |
| गौशाला | सांस्कृतिक पहचान का विनाश |
| निःशुल्क आयुर्वेदिक चिकित्सा | "चिकित्सा चाल" से धर्मान्तरण |
| आवास निर्माण | घर के बदले धर्मान्तरण |
| रोज़गार | ग़रीबी का शोषण |
| गुरुकुल | बच्चों का ब्रेनवॉश |
| घर वापसी | धर्मान्तरित हिन्दुओं को वापस लाना |
| एक मंच | हिन्दू एकता |
| तुलसी/मातृ-पितृ पूजन | सांस्कृतिक प्रतिकार |
निष्कर्ष
बापू जी की ये पहल केवल "सेवा कार्य" नहीं थीं - ये एक रणनीतिक धर्मान्तरण विरोधी अभियान था जिसने ईसाई मिशनरियों के करोड़ों-अरबों रुपयों के निवेश को निष्फल कर दिया। हर उस कमज़ोरी पर बापू जी ने प्रहार किया जिसका फ़ायदा मिशनरी उठाते थे।
यही कारण है कि बापू जी को निशाना बनाया गया। बापू जी निर्दोष हैं - और उन पर लगे आरोप उन शक्तियों का बदला है जिनके अरबों रुपयों के धर्मान्तरण उद्योग को बापू जी ने चुनौती दी।
"जो शक्ति अकेले दम पर अरबों डॉलर के मिशनरी साम्राज्य के सामने खड़ी हो गई - उसे जेल में बंद करना ज़रूरी था। लेकिन सत्य को कोई जेल बंद नहीं कर सकती।"
यह लेख हिन्दू महासंकल्प सभा की शोध टीम द्वारा संकलित है। सत्य को साझा कीजिए।